Friday, September 18, 2026

राकेश केशवानी के संकल्प से बदली बेजुबानों की तकदीर, संघर्ष से सफलता के 9 साल पढिए पूरी खबर आप भी बन सकते हैं जन सेवा से मिसला 

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राकेश केशवानी के संकल्प से बदली बेजुबानों की तकदीर, संघर्ष से सफलता के 9 साल पढिए पूरी खबर आप भी बन सकते हैं जन सेवा से मिसला

 

खरसिया। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की हृदयस्थली और धर्मनगरी के रूप में विख्यात खरसिया आज पूरे देश में गौसेवा के एक बड़े केंद्र के रूप में अपनी नई पहचान बना चुका है। इस सेवा यात्रा के पीछे एक ऐसे शख्स का अटूट संकल्प है, जिसने सड़क पर तड़पते गोवंश की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझा और बिना किसी सरकारी मदद या बड़ी संस्था के इंतजार के, अकेले ही इस दुर्गम पथ पर निकल पड़े। खरसिया के प्रमुख गौसेवक राकेश केशवानी की गौसेवा के आज नौ वर्ष पूरे हो गए हैं, जो न केवल बेजुबानों की सेवा का प्रतीक है, बल्कि अटूट श्रद्धा और संघर्ष से मिली विजय की एक जीती-जागती मिसाल भी है।

 

*संकल्प पुरा होता हुआ खरसिया नगर आस-पास पंद्रह बीस गौसेवा टीम तैयार*

आज से ठीक नौ साल पहले की बात है जब खरसिया की सड़कों के किनारे दुर्घटना का शिकार हुए और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त गोवंश की दुर्दशा देखकर राकेश केशवानी का मन विचलित हो उठा। उस समय स्थिति ऐसी थी कि धूप और बरसात में घायल गोवंश सड़कों पर पड़े रहते थे, घावों में कीड़े पड़ जाते थे और बेसुध अवस्था में उन्हें आवारा कुत्ते नोचते थे। राकेश केशवानी ने इस विकट समस्या को लेकर उस वक्त नगर पालिका, पशु चिकित्सालय और विभिन्न गौशालाओं के चक्कर लगाए, मिन्नतें कीं, लेकिन किसी ने भी उन बेसहारा घायलों को रखने की जिम्मेदारी नहीं ली। यहां तक कि कई गौपालक भी अपने गोवंश के घायल होने पर उन्हें मरता छोड़ कर चले जाते थे। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में राकेश केशवानी ने स्वयं मोर्चा संभाला और नगर पालिका के प्रांगण में ही घायल गोवंश की सेवा और उपचार शुरू किया। शुरुआत में नगर पालिका के कुछ कर्मचारियों का साथ मिला और फिर धीरे-धीरे कारवां बढ़ता गया।

*निरंतर जागरूकता से युवाओं की फ़ौज तैयार हुई*

सेवा की इस लौ को जलाए रखने के लिए उन्होंने खरसिया स्टेशन चौक के पास खाली पड़ी जमीन पर एक अस्थाई टेंटनुमा झोपड़ी बनाई, जहां आज चौपाटी स्थित है। राकेश केशवानी के इस निस्वार्थ कार्य को देखकर नगर के युवाओं का खून भी उबाल मारने लगा और देखते ही देखते 20 से 25 ऊर्जावान युवाओं की एक ऐसी फौज तैयार हो गई, जो दिन-रात बेजुबानों की सेवा में जुट गई। गौसेवा के साथ-साथ राकेश केशवानी ने जनजागरूकता का भी बीड़ा उठाया और गोपाष्टमी, दुर्गाष्टमी तथा रामनवमी जैसे पावन अवसरों पर भव्य शोभायात्रा और गौ-भंडारा का आयोजन शुरू किया।

 

*खरसिया से निराश्रित कुत्तों कि खुजलीनाशक दवा अभियान देश का अभियान बना*

कोरोना काल की विभीषिका के दौरान जब निराश्रित कुत्तों में एक अजीब तरह की खुजली की बीमारी फैली, तब भी राकेश केशवानी पीछे नहीं हटे। जब कहीं से मदद नहीं मिली तो उन्होंने दिल्ली के चिकित्सक से सलाह लेकर ऑनलाइन दवाइयां मंगवाईं और खुद कुत्तों का उपचार किया, जिससे उनकी जान बच सकी।

 

*गौ भंडारा पुरे देश में बनी परंपरा*

खरसिया से ही शुरू हुआ ‘गौ-भंडारा’ आज एक परंपरा बन चुका है, जहां सड़कों पर भटक रहे भूखे-प्यासे गोवंश को दलिया, चावल, हरी सब्जियां और चारा खिलाया जाता है।

*खरसिया से नीकली कई अभियान पुरे प्रदेश में अनुशरण*

सुरक्षा कवच के रूप में रेडियम बेल्ट पहनाना, लम्पी वायरस के खिलाफ टीकाकरण अभियान और जगह-जगह पानी की कोटना रखवाना जैसे कार्यों की शुरुआत राकेश केशवानी ने खरसिया की धरती से ही की, जिसका अनुसरण आज प्रदेश के कई जिलों में हो रहा है। उनकी प्रेरणा से आज डभरा, चंद्रपुर, जैजैपुर, बोतल्दा, सरवानी, फरसवानी और चपले जैसे सैकड़ों गांवों और शहरों में गौसेवा टीमें सक्रिय हैं।

 

*हजारों गौवंश जीवों के प्राण रक्षा में सफलता*

राकेश केशवानी के नौ वर्षों के इस सफर में हजारों गोवंश और अन्य बेजुबानों की जान बचाई गई है और जो गोवंश उपचार के दौरान गोलोकवासी हो जाते हैं, उन्हें पूरे सम्मान के साथ भू-समाधि दी जाती है।

 

*गौसेवा से जुड़ना प्रेरणादायक*

राकेश केशवानी के गौसेवा से जुड़ने की कहानी बेहद भावुक और प्रेरणादायक है। एक समय था जब 2011 से पहले उनका करोड़ों का कारोबार था, लेकिन 11 नवंबर 2011 को बेजाकब्जा के नाम पर दुकान टूटने के बाद उनके जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। आगजनी और लगातार व्यापारिक नुकसान के कारण उनकी जमा-पूंजी और प्रॉपर्टी हाथ से निकल गई। कर्ज के बोझ और अपनों की मानसिक प्रताड़ना के बीच जब वे पूरी तरह टूट चुके थे, तब उन्होंने खुद को गौसेवा के पवित्र कार्य में झोंक दिया।

*गौमाता कि आशिर्वाद से जीवन में खुशहाली लौटी*

राकेश केशवानी का मानना है कि गौमाता के आशीर्वाद से ही उनके जीवन में फिर से खुशहाली लौटी, बच्चे काबिल हुए और खोया हुआ मान-सम्मान व कारोबार वापस मिला। आज वे अपने सात माह के पोते के साथ सुखद जीवन व्यतीत कर रहे हैं और समाज को यही संदेश दे रहे हैं कि गौसेवा ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म और कल्याण का मार्ग है।

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